पत्रकारिता

जो मैनें देखा, जाना,समझा

अमेजॅन पर उपलब्ध

किंडल संस्करण : रु.51.45

हार्डकवर पुस्तक संस्करण : रु. 295.00

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संक्षिप्त में:-

स्वतंत्रता मिलने के बाद देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई। प्रकारांतर में अखबारों की भूमिका लोकतंत्र के प्रहरी की हो गई और इसे कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका के बाद लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ कहा जाने लगा।

कालांतर में ऐसी स्थितियाँ बनीं कि खोजी खबरें अब होती नहीं हैं; मालिकान सिर्फ पैसे कमा रहे हैं। पत्रकारिता के उसूलों-सिद्धांतों का पालन अब कोई जरूरी नहीं रहा। फिर भी नए संस्करण निकल रहे हैं और इन सारी स्थितियों में कुल मिलाकर मीडिया की नौकरी में जोखिम कम हो गया है और यह एक प्रोफेशन यानी पेशा बन गया है। और शायद इसीलिए पत्रकारिता की पढ़ाई की लोकप्रियता बढ़ रही है, जबकि पहले माना जाता था कि यह सब सिखाया नहीं जा सकता है।

अब जब छात्र भारी फीस चुकाकर इस पेशे को अपना रहे हैं तो उनकी अपेक्षा और उनका आउटपुट कुछ और होगा। दूसरी ओर मीडिया संस्थान पेशेवर होने की बजाय विज्ञापनों और खबरों के घोषित-अघोषित घाल-मेल में लगे हैं। ऐसे में इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों को यह बताना है कि कैसे यह पेशा तो है, पर अच्छा कॅरियर नहीं है और तमाम लोग आजीवन बगैर पूर्णकालिक नौकरी के खबरें भेजने का काम करते हैं और जिन संस्थानों के लिए काम करते हैं, वह उनसे लिखवाकर ले लेता है कि खबरें भेजना उनका व्यवसाय नहीं है।………………

GST – 100 Jhanjhat

More than a year has passed since the introduction of GST. While, the country is still debating whether the new regime has been a success or failure, I couldn’t help but take note of the several complications, hurdles and confusions it has created. This brought me to author a book which loosely translates to ‘GST: 100 Complications’(जीएसटी 100 झंझट).

As the name suggests, the book is a collection of things that are wrong with the new tax regime. Chapters range from my own personal experiences, outlining the flawed system of GST levy to the difficulties faced by small traders. It describes how the professionals and the community will be affected. By nature, this is a tax which is tilted towards the big businesses.

As a reader you will feel that this is your voice and raises the objections you should have raised. As is the dedication in the book, it is dedicated to the small traders who could neither understand it, comprehend it , oppose it but had to accept it.

MRP : Rs. 299.00

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